ऋग्वैदिक काल

ऋग्वैदिक काल

ऋग्वैदिक काल

आर्यों का मूल निवास आल्प्स पर्वत के पूर्वी क्षेत्र के आस-पास बताया जाता है। जो वर्तमान में यूरेशिया कहलाता है। मैक्समूलर के अनुसार आर्यों का निवास स्थान मध्य एशिया माना गया है जो सर्वाधिक मान्य अवधारणा है। भारत में आर्यों की जानकारी ऋग्वेद से मिलती है इस वेद में आर्य शब्द का उल्लेख 36 बार हुआ है। आर्यों का मुख्य व्यवसाय पशुचारण था एवं कृषि का स्थान गौण था। 

आर्य समाज पुरूष प्रधान था। पालतू घोड़े पहली बार ईसा-पूर्व छठी सहस्त्राब्दि में काला सागर और यूराल पर्वत के क्षेत्र में प्रयोग में लाए गए। 3000 ईसा पूर्व यूराल क्षेत्र में घोड़े की लगभग 60,000 अस्थियाँ मिली हैं।

ऋग्वैदिक काल के अध्ययन के लिए साहित्यिक तथा पुरातात्विक साक्ष्यों का सहारा लिया जाता है

साहित्यिक साक्ष्य

ऋग्वेद : ऋग्वेद एक संहिता है जिसमें दस मण्डल तथा 1028 सूक्त हैं। ऋग्वेद के तीन पाठ हैं।

  •  साकल -1017 मंत्र,
  •  बालखिल्य -11 मंत्र,
  •  वाष्कल -56 मंत्र

पुरातात्विक साक्ष्य

बोगाजकोई अभिलेख (मितन्नी अभिलेख)

1400 ई.पू. के एक लेख में हित्ती राजा सुब्विलिम्मा और मितन्नी राजा मतिऊअजा के मध्य हुई संधि के साक्षी के रूप में वैदिक देवताओं इन्द्र, वरुण, मित्र, नासत्य का उल्लेख किया गया है। इसके अतिरिक्त इनका उल्लेख ऋग्वेद में भी किया गया है।

कस्साइट अभिलेख

1600 ई.पू. के इस अभिलेख में यह सूचना मिलती है कि ईरानी आर्यों की एक शाखा भारत आई थी।

 ऋग्वेद

भारत आगमन के क्रम में आर्य मध्य एशिया और ईरान से  पहुँचे। भारत में आर्यों की जानकारी ऋग्वेद से मिलती है। ऋग्वेद हिन्द-यूरोपीय भाषाओं का सबसे प्राचीनतम और पवित्र ग्रंथ है। ऋग्वेद में अग्नि, इन्द्र , मित्र, वरूण आदि देवताओं की स्तुतियाँ संग्रहीत हैं, जिनकी रचना विभिन्न गोत्रों के ऋषियों और मन्त्रसृष्टाओं ने की है।

इसमें दस मंडल या भाग हैं, जिनमें मंडल 2 से 7 तक प्राचीनतम् अंश हैं। प्रथम और दशम मंडल सबसे अन्त में जोड़े गए हैं। ऋग्वेद के मंत्रों का पाठ करने वाला पुरोहित होतृ कहलाता था।

इराक में मिले लगभग 1600 ई.पू. के कस्साइट अभिलेखों में तथा  सीरिया में मितन्नी अभिलेखों में आर्य नामों का उल्लेख मिलता है। समय पूर्व हुआ।

चौथे मण्डल के तीन मंत्रों की रचना तीन राजाओं ने की है। त्रासदस्यु, अजमीढ़ तथा पुरमीढ़। नौवाँ मण्डल सोम को समर्पित है। अतः इसे सोममण्डल कहा गया है। दसवाँ मण्डल सबसे अन्त में जोड़ा गया है अतः इसी के एक भाग, पुरुष सूक्त में चतुर्वर्ण व्यवस्था की स्थापना की सूचना मिलती है। इसी मण्डल में देवी सूक्त का उल्लेख है जिसमें वाक् शक्ति की उपासना की गई है

ऋग्वेद के ब्राह्मण ग्रंथ ऐतरेय व कौषितिकी हैं। आयुर्वेद को ऋग्वेद का उपवेद कहा जाता है। ऋग्वेद की सर्वाधिक पवित्र नदी सरस्वती थी। इसे नदीतमा (नदियों में सर्वश्रेष्ठ) कहा गया है। ऋग्वेद में यमुना का उल्लेख तीन बार एवं गंगा (जाह्नवी) का उल्लेख 1 बार (10वें मंडल में) मिलता है। असतो मा सद्गमय वाक्य ऋग्वेद से लिया गया है।

ऋग्वैदिक काल
ऋग्वैदिक काल

आर्य शब्द से एक जाति विशेष को समझा जाता है। आरंभिक भारतीय विद्वानों ने इस शब्द का यही अर्थ लगाया है। आर्यों को भारतीय सभ्यता व संस्कृति का संस्थापक माना गया है। आर्य शब्द संस्कृत भाषा से लिया गया है, जिसका अर्थ उत्तम, श्रेष्ठ व्यक्ति या उच्च कुल में उत्पन्न माना जाता है।

आरम्भिक आर्यों का निवास पूर्वी अफगानिस्तान, पाकिस्तान और भारत के पंजाब तथा हरियाणा से था। ऋग्वेद में अफगानिस्तान की कुर्रम तथा कुभा आदि कुछ नदियों तथा सिंधु और उसकी पाँच सहायक नदियों का उल्लेख है। सिंधु आर्यों की सबसे प्रमुख नदी है, जिसका उन्होंने बार-बार उल्लेख किया है।

सामवेद

साम का तात्पर्य गान से है। सामवेद से ही सर्वप्रथम 7 स्वरों (सा…रे…गा…मा…प…ध…नि) की जानकारी प्राप्त होती है इसलिए इसे भारतीय संगीत का जनक माना जाता है। सामदेव के मंत्र सर्यदेवता को समर्पित हैं। 

 पुराणों में सामवेद की सहस्त्र शाखाओं का उल्लेख है। सामवेद व अथर्ववेद के कोई आरण्यक नहीं हैं। सामवेद का ऋत्विक उद्गाता कहलाता था, जिसका कार्य ऋचाओं का सस्वरगान करना था। सामवेद का उपवेद गन्धर्ववेद कहलाता है। सामवेद के प्रमुख उपनिषद छान्दोग्य तथा जैमिनीय हैं तथा मुख्य ब्राह्मण ग्रन्थ पंचविश है।

यजुर्वेद

यजु का अर्थ यज्ञ से है। इसमें यज्ञ की विधियों का प्रतिपादन किया गया है। इसमें यज्ञ व बलि सम्बंधी मंत्रों का वर्णन है। यजुर्वेद गद्य व पद्य दोनों में लिखा गया है। यजुर्वेद का ऋत्विक अध्वर्यु कहलाता था, जिसका कार्य इस वेद के मौलिक गद्य भाग को पढ़ना तथा यज्ञ सम्बंधी कार्य करना था।  धनुर्वेद को यजुर्वेद का उपवेद कहा जाता है। यजुर्वेद में सर्वप्रथम राजसूय एवं वाजपेय यज्ञ का उल्लेख मिलता है।  यजुर्वेद में हाथियों के पालन का उल्लेख है। •ऋग्वेद, सामवेद तथा यजुर्वेद को वेदत्रयी के नाम से जाना जाता है।

यजुर्वेद के 2 प्रधान रूप

  • कृष्ण यजुर्वेद- इसकी 4 शाखाएँ हैं (i) काठक (ii) कपिष्ठल (iii) मैत्रेयी (iv) तैत्तरीय संहिता।
  • शुक्ल यजुर्वेद (इसे वाजसनेयी संहिता भी कहते हैं।)।

अथर्ववेद

अथर्ववेद को ब्रह्मवेद (श्रेष्ठ वेद) कहा जाता है। अथर्वा ऋषि के नाम पर इस वेद का नाम अथर्ववेद पड़ा। अथर्ववेद का ब्राह्मण ग्रंथ गोपथ है। इसमें याज्ञिक अनुष्ठानों का वर्णन नहीं है।   अथर्ववेद में 20 अध्याय, 731 सूक्त व 6000 मंत्र हैं। इसमें वशीकरण, जादू-टोना, भूत-प्रेतों व औषधियों से सम्बद्ध मंत्रों का वर्णन है। अथर्ववेद में कुरू के राजा परीक्षित का उल्लेख है, जिन्हें मत्यलोक का देवता बताया गया है।

अथर्ववेद का उपवेद शिल्पवेद कहलाता है। काशी का प्राचीनतम् उल्लेख अथर्ववेद में मिलता है। अथर्ववेद के मंत्रों का उच्चारण करने वाले पुरोहित को ब्रह्म कहा जाता था। अथर्ववेद में सभा व समिति को प्रजापति की दो पुत्रियाँ कहा गया है। अथर्ववेद का एक मात्र ब्राह्मण ग्रन्थ गोपथ ही है। इनके उपनिषदों में-मुण्डकोपनिषद्, प्रश्नोपनिषद् तथा माडूक्योपनिषद् मुख्य हैं।

आरण्यक

आरण्यक मूलतः ब्राह्मण ग्रन्थों के परिशिष्ट के रूप में पाए जाते हैं। वनों में रचे जाने के कारण ये आरण्यक कहे गए हैं। वर्तमान में उपलब्ध 7 प्रमुख आरण्यक ऐतरेय, तैत्तरीय, माध्यन्दिन, शंखायन, मैत्रायणी, तलवकार और वृहदारण्यक हैं। 

उपनिषद्

यह भारतीय दार्शनिक विचारों का प्राचीनतम संग्रह है। इनमें शुद्धतम ज्ञानपक्ष पर बल दिया गया है। उपनिषदों को भारतीय दर्शन का स्रोत अथवा पिता माना जाता है। उपनिषदों की कुल संख्या 108 है। ये वेदों से सम्बंधित हैं। सामवेद से सम्बंधित छान्दोग्य उपनिषद् में तत्वमसि का प्रथम उल्लेख है। वृहदारण्यकोपनिषद् में अश्वमेध यज्ञ की विवेचना की गई है। 

कठोपनिषद् में यम तथा नचिकेता का संवाद वर्णित है यमराज ने नचिकेता को आध्यात्म तत्व की शिक्षा दी। भारत का राष्ट्रीय आदर्श वाक्य सत्यमेव जयते मुण्डकोपनिषद् में उल्लिखित है। राजा की उत्पत्ति सिद्धांत का वर्णन सर्वप्रथम ऐतरेय ब्राह्मण में मिलता है। आर्य लोग जहाँ प्रथमतः बसे वह सम्पूर्ण प्रदेश सप्तसिंधु (सात नदियों का देश) के नाम से प्रसिद्ध हुआ। इसमें अफगानिस्तान का भाग भी सम्मिलित था। ईशोपनिषद् में याज्ञवल्क्य और श्वेतकेतु संवाद है। मुण्डकोपनिषद् में शिक्षा के विषयों में वेदांगों को भी शामिल किया गया है।

जनजातीय संघर्ष

ऋग्वेद में इंद्र को पुरंदर कहा गया है, जिसका अर्थ है, दुर्गों को तोड़ने वाला। आर्यों के पाँच कबीले अर्थात् जन थे, जिनका समुदाय पंचजन कहलाता था। ये अनु., पुरू, तुर्वस, दुहा तथा यद् थे। भरत और वित्स आर्यों के शासक वंश थे तथा पुरोहित वशिष्ठ दोनों वंशों के समर्थक थे। इस देश का नाम इसी भरत कुल के आधार पर भारतवर्ष पड़ा। इस कुल या कबीले का उल्लेख सबसे पहले ऋग्वेद में मिलता है।

भरत और दस राजाओं के मध्य जो युद्ध हुआ, वह दशराज युद्ध (दस राजाओं के बीच युद्ध) के रूप में विदित है। इस युद्ध का कारण भरत वंश के राजा सुदास द्वारा अपने पुरोहित विश्वामित्र को हटाकर उनके स्थान पर वशिष्ठ को नियुक्त करना था। सुदास द्वारा अपमानित किए जाने पर विश्वामित्र ने पंचजनों के साथ अन्य कबीलों (जन) को संगठित कर सुदास से युद्ध किया। यह युद्ध परुष्णी नदी के तट पर हुआ, जिसकी पहचान वर्तमान की रावी नदी से की जाती है। इसमें सुदास की जीत हुई और भरत कबीले की प्रभुता कायम हुई।

ऋग्वेद के 7वें मंडल में दशराज्ञ युद्ध का उल्लेख है। इसका एक कारण राज्य-विस्तार भी माना जाता है। कुरु जनों ने पांचालों के साथ मिलकर उच्च गंगा मैदान में अपना संयुक्त राज्य स्थापित किया।

भौतिक जीवन

ऋग्वैदिक आर्यों के भौतिक जीवन के बारे में कुछ आभास मिलता है। भारत में उनकी सफलता के कारण थे- घोड़े, रथ और संभवत: काँसे के कुछ कुशल अस्त्र शस्त्र व उपकरण जिनके बारे में हमें पुरातात्विक प्रमाण नाममात्र के मिले हैं। संभवतः उन्होंने आरावाला पहिया भी चलाया, जो सबसे पहले कॉकेशस क्षेत्र में 2300 ई. पू. में प्रयोग में लाया गया था ।

उन्हें राजस्थान की खेतड़ी खानों से ताँबा मिलता रहा होगा। ऋग्वेद के प्राचीनतम् भाग में फाल का उल्लेख मिलता है। उन्हें बुआई, कटाई और दावनी का ज्ञान था। आर्यों को विभिन्न ऋतुओं के बारे में जानकारी थी। ऋग्वैदिक आर्यों के अधिकांश युद्ध गाय को लेकर हुए हैं। ऋग्वेद में युद्ध का पर्याय गविष्टि (गाय का अन्वेषण) है। गाय सर्वोत्तम धन मानी जाती थी।

ऋग्वैदिक लोग गाय चराने, खेती करने और बसने के लिए भूमि पर अधिकार करते थे, परन्तु भूमि निजी संपत्ति नहीं होती थी। ऋग्वेद में बढ़ई, रथकार, बुनकर, चर्मकार, कुम्हार आदि शिल्पियों के उल्लेख मिलते हैं।  ताँबे या काँसे के अर्थ में अयस् शब्द का प्रयोग होता था। स्पष्ट है कि उन्हें धातुकर्म की जानकारी थी।

आर्य लोग शहरों में नहीं रहते थे, संभवतः वे किसी तरह का गढ़ बनाकर या मिट्टी के घर बनाकर गाँवों में रहते थे।

जनजातीय राजव्यवस्था 

ऋग्वैदिक काल में आर्यों का प्रशासनिक तन्त्र कबीले के प्रधान के हाथों में था। वह राजन (अर्थात् राजा) कहलाता था। ऋग्वैदिक काल में राजा का पद आनुवंशिक हो चुका था।  राजा एक प्रकार का सरदार (मुखिया) था। उसके पास असीमित अधिकार नहीं थे, क्योंकि उसे कबीलों से सलाह लेनी पड़ती थी।

कबीले की आम सभा जो समिति कहलाती थी, अपने राजा का चुनाव करती थी। वह कबीले के मवेशी की रक्षा करता था, युद्ध का नेतृत्व करता था और कबीले की ओर से देवताओं की प्रार्थना करता था। सभा, समिति, विथ एवं गण जैसे संगठन विचार-विमर्श करते थे तथा सैनिक और धार्मिक कार्य देखते थे। ऋग्वैदिक काल में स्त्रियाँ सभा और विथ में भाग लेती थीं।

सभा (वर्तमान लोकसभा)

ऋग्वेद में सभा शब्द का 8 बार प्रयोग हुआ है। सभा के पुरुष सदस्यों के लिए सभेय शब्द और स्त्री सदस्यों के लिए सभावती शब्द आया है।

समिति (वर्तमान राज्य सभा)

ऋग्वेद में समिति का उल्लेख 9 बार हुआ है, परन्तु उत्तरवैदिक काल में इसका महत्व बढ़ता हुआ प्रतीत होता है। अथर्ववेद में सभा व समिति को प्रजापति की पुत्रियाँ कहा गया है। अथर्ववेद में इस बात का प्रमाण मिलता है, कि समिति में स्त्रियों का प्रवेश संभव था।

विद्य ऋग्वैदिक काल में इस संस्था का प्रचलन अधिक था। इस बात का प्रमाण है कि ऋग्वेद में विदथ शब्द का प्रयोग 122 बार हुआ है, जबकि आरण्यक ग्रंथों के चरण में आकर इसका प्रयोग प्राय: लुप्त हो गया है। विथ को विशिष्ट संस्था के रूप में माना गया है, जिसमें वृद्धों एवं विद्वानों की सहभागिता होती थी।

दैनिक प्रशासन में कुछ अधिकारी राजा की सहायता करते थे। सबसे महत्वपूर्ण अधिकारी पुरोहित होता था। पुरोहित के बाद संभवतः सेनानी का स्थान था, जो भाला, कुल्हाड़ी एवं तलवार आदि शस्त्र चलाना जानता था। युद्ध में प्राप्त भेंट और लूट की वस्तुएँ वैदिक सभा में बाँट दी जाती थीं। चरागाह या बड़े जत्थे का प्रधान वाज्रपति कहलाता था। परिवारों के प्रधानों को, कुलप तथा लड़ाकू दलों के प्रधानों को ग्रामीण कहा जाता था।  राजा कोई नियमित या स्थायी सेना नहीं रखता था, लेकिन युद्ध के समय स्वजनों की सेना (मिलिशिया) संगठित कर लेता था।

कबीला और परिवार

 व्यक्ति की पहचान उसके कुल या गोत्र से होती थी। लोगों की सबसे अधिक आस्था अपने-अपने कबीले के प्रति रहती थी, जिसे जन कहा जाता था। ऋग्वेद में जन शब्द का उल्लेख लगभग 275 बार हुआ है, परन्तु जनपद (अर्थात् राज्यक्षेत्र) शब्द एक बार भी नहीं आया है। ऋग्वेद में दूसरा महत्वपूर्ण शब्द विश है, जो कबीले के अर्थ में मिलता है।

ऋग्वेद में इसका उल्लेख 170 बार हुआ है। वैश्य नामक बहुसंख्यक वर्ग का उदय इसी विश या कबायली जनसमूह से हुआ है। आरम्भिक वैदिक अवस्था में परिवार के अर्थ में गृह शब्द का उल्लेख मिलता था, जो ऋग्वेद में बार-बार आया है। यह समाज पितृसत्तात्मक था, परिवार में पिता मुखिया होता था। परिवार की कई पीढ़ियाँ एक घर में साथ-साथ रहती थीं। इस समाज के लोग हमेशा वीर पुत्रों की प्राप्ति के लिए देवताओं से प्रार्थना करते थे।

ऋग्वेद में बेटी के लिए कामना व्यक्त नहीं की गई है, जबकि प्रजा (संतान) और पशु की कामना सूक्तों में बार-बार मिलताहै। स्त्रियाँ सभा-समितियों में भाग ले सकती थीं। वे पतियों के साथ यज्ञों में आहुतियाँ दे सकती थीं। सूक्तों की रचना मौखिक होती थी और उस काल का कोई लेख नहीं मिला है। ऋग्वेद में नियोग-प्रथा और विधवा-विवाह के प्रचलन का आभास मिलता है। बाल-विवाह का कोई उदाहरण नहीं है।

सामाजिक वर्गीकरण

वर्ण शब्द का प्रयोग रंग के अर्थ में होता था, ऐसा प्रतीत होता है कि आर्य भाषा-भाषी गौर वर्ण के थे और मूलवासी लोग काले रंग के थे। ऋग्वेद में आर्य वर्ण और दास वर्ण का उल्लेख है। धीरे-धीरे कबायली समाज तीन वर्गों में विभक्त हो गया- योद्धा, पुरोहित और सामान्य लोग (प्रजा)। चौथा वर्ग जो शूद्र कहलाता था। इसका साक्ष्य ऋग्वेद काल के अंत में मिलता है। इसका सर्वप्रथम उल्लेख ऋग्वेद के दशम् मंडल में है, जो सबसे अन्त में जोड़ा गया है।

ऋग्वेद युग में व्यवसाय के आधार पर समाज में विभेदीकरण आरम्भ हुआ। ऋग्वेद में किसी परिवार का एक सदस्य कहता है- मैं कवि हूँ, मेरे पिता वैद्य हैं और मेरी माता चक्की चलाने वाली है, भिन्न-भिन्न व्यवसायों से जीविकोपार्जन करते हुए हम एक साथ रहते हैं।

ऋग्वैदिक देवता

बोगाजकोई अभिलेख (1400 ई.पू.) में अनेक वैदिक देवताओं  (मित्र, वरूण, इंद्र नासत्य) का उल्लेख किया गया है। इन देवताओं का उल्लेख ऋग्वेद में भी किया गया है। ऋग्वेद में सबसे अधिक महत्वपूर्ण देवता इंद्र हैं, जिन्हें पुरंदर अर्थात् किले को तोड़ने वाला कहा गया है। इंद्र पर 250 सूक्त हैं। इन्द्र को वर्षा का देवता माना गया है, जो वर्षा कराते हैं। अग्नि का दूसरा स्थान है। इस पर 200 सूक्त हैं। अग्नि की भूमिका जंगलों को जलाने, खाना पकाने आदि कार्यों में थी।

तीसरा स्थान वरुण का है, जो जल या समुद्र का देवता माना गया है। इसे ऋत् अर्थात् प्राकृतिक संतुलन का रक्षक कहा गया है। सोम को वनस्पतियों का अधिपति माना गया है तथा एक मादक रस सोमरस इसी के नाम पर पड़ा है। ऋग्वेद का नवम् मण्डल सोम की स्तुति करता है।

ऋग्वेद में ऊषा, अदिति, सूर्या आदि देवियों का उल्लेख है। ऋत् की व्याख्या सृष्टि की नियमितता, भौतिक एवं नैतिक व्यवस्था एवं अंतरिक्षीय व्यवस्था आदि रूपों में की गयी है। उत्तरवैदिक काल में ऋत् पूर्ण रूप से लुप्त हो चुका था।  ऋग्वेद के एक मंत्र में रुद्र (शिव) को त्रयम्बक कहा गया। 

मारुत आँधी के देवता के रूप में जाने जाते थे। देवताओं में कुछ देवियाँ, जैसे अदिति और ऊषा, जो प्रभात के प्रतिरूप हैं। देवताओं की उपासना की मुख्य रीति स्तुतिपाठ करना व यज्ञ-बलि (चढ़ावा) अर्पित करना था। स्तुति पाठ पर अधिक बल दिया गया था। सामान्यतः प्रत्येक कबीले या गोत्र का अपना अलग देवता होता था। बलि या आहूति में शाक, जौ आदि वस्तुएँ दी जाती थीं। यज्ञाहूति के अवसर पर आनुष्ठानिक या याज्ञिक मंत्र नहीं पढ़े जाते थे। पूषन ऋग्वैदिक काल में पशुओं के देवता थे जो उत्तर वैदिक काल में शूद्रों के देवता हो गये।

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